यह दंतुरित मुसकान (NCERT Class 10 - क्षितिज भाग 2)

नागार्जुन 05 Aug, 2026 11 बार पढ़ा गया

कविता का मुख्य संदेश:

एक छोटे बच्चे की निश्छल और निर्दोष मुस्कान में इतनी ऊर्जा होती है कि वह कठोर से कठोर और निराश मन में भी जीवन का नया रस भर देती है।

कविता:

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान मृतक में भी डाल देगी जान धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात… छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल रहे जलजात! परस पाकर तुम्हारा ही प्राण, पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण!

छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफ़ालिका के फूल बाँस था कि बबूल? तुम मुझे पाए नहीं पहचान? देखते ही रहोगे अनिमेष? थक गए हो? आँख लूँ मैं फेर?