रवींद्रनाथ ठाकुर की 'आत्मत्राण' - कविता, भावार्थ एवं अर्थ (NCERT Class 10 Hindi)
रवींद्रनाथ ठाकुर (अनुवाद: हजारीप्रसाद द्विवेदी)
05 Aug, 2026
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रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) की प्रसिद्ध कविता 'आत्मत्राण' (हिंदी अनुवाद: हजारीप्रसाद द्विवेदी) एनसीआरती कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक 'स्पर्श' भाग-2 में संकलित है। 'आत्मत्राण' का अर्थ है- भय से मुक्ति या अपनी रक्षा स्वयं करने की शक्ति। इस कविता में कवि ईश्वर से दुखों व विपत्तियों से दूर रखने की नहीं, बल्कि उनका सामना करने के लिए आत्मबल और साहस मांगते हैं।
कविता का मूल सार एवं संदेश
- संघर्ष की प्रेरणा: कवि भगवान से यह नहीं कहते कि वे जीवन में दुख या मुसीबत आने ही न दें।
- निर्भीकता की मांग: कवि प्रार्थना करते हैं कि विपत्तियों के आने पर भी उनके मन में भय न पैदा हो और वे उनका डटकर मुकाबला कर सकें।
- स्वयं पर भरोसा: यदि संकट के समय कोई मदद न मिले, तब भी वे निराश न हों और अपने बाहुबल (पौरुष) पर भरोसा रखें।
- प्रमुख काव्यांश और उनका भावार्थ
- पहला अंश:
“विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं,
केवल इतना हो करुणात्मक, कभी ना विपदा में पाऊँ भय।”- अर्थ: हे ईश्वर! मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि आप मेरे जीवन से सभी संकटों और मुश्किलों को दूर रखें। मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुसीबत आने पर मेरा हौसला न टूटे और मैं डर से न घबराऊँ।
- दूसरा अंश:
“दुख-ताप से व्यथित चित्त को ना दो सांत्वना नहीं सही,
पर इतना होवे करुणामय, दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।”- अर्थ: यदि मेरा मन दुखों की तपन से पीड़ित हो, तो भले ही आप मुझे सांत्वना (ढांढस) न दें। हे दयालु प्रभु! बस मुझे इतनी शक्ति दें कि मैं हर परिस्थिति में दुख पर विजय प्राप्त कर सकूँ।
- तीसरा अंश:
“कोई कहीं सहायक ना मिले तो अपना बल-पौरुष ना हिले,
जगत में लाभ अगर वंचना रही, तो भी मन में ना मानूँ क्षय।”- अर्थ: यदि मुझे जीवन में किसी की सहायता न मिले, तब भी मेरा खुद का बल और साहस कम न हो। यदि संसार में मुझे लाभ के स्थान पर धोखा (वंचना) ही मिले, तब भी मेरा मन कमजोर न पड़े और मैं हार न मानूँ।
- कविता से मिलने वाली सीखयह कविता हमें सिखाती है कि मनुष्य को कायर बनकर ईश्वर से सुख की भीख नहीं मांगनी चाहिए। जीवन की कठिनाइयों से भागने के बजाय पुरुषार्थ और आत्मबल के साथ उनका सामना करना ही सच्ची मनुष्यता है।📌 परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु (Key Points)
- कवि और अनुवादक: मूल कविता गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित है और इसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।
- शीर्षक का अर्थ: 'आत्मत्राण' का अर्थ है - अपनी आत्मा का भय से त्राण (मुक्ति) या स्वयं की रक्षा करने की शक्ति पाना।
- अनोखी प्रार्थना: यह पारंपरिक प्रार्थनाओं से अलग है। इसमें कवि ईश्वर से कष्ट दूर करने की भीख नहीं माँगते, बल्कि कष्टों से लड़ने की शक्ति माँगते हैं।
- मुख्य संदेश: मनुष्य को कर्मप्रधान बनना चाहिए। संकट के समय घबराने के बजाय आत्मनिर्भरता और आत्मबल (सच्चे पौरुष) पर भरोसा रखना चाहिए।
📝 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Q&A)प्रश्न 1: कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना कर रहा है?उत्तर: कवि ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि विपत्तियाँ आने पर वे भयभीत न हों। यदि दुखों के समय उन्हें सांत्वना देने वाला कोई न मिले, तब भी उनका आत्मबल और पौरुष न डगमगाए। वे हर परिस्थिति में दुखों पर विजय पाने की शक्ति माँगते हैं।प्रश्न 2: 'आत्मत्राण' कविता अन्य प्रार्थना गीतों से किस प्रकार भिन्न है?उत्तर: सामान्य प्रार्थना गीतों में लोग ईश्वर से दुख, कष्ट और बीमारियाँ दूर करने की गुहार लगाते हैं या सुख-संपत्ति माँगते हैं। इसके विपरीत, 'आत्मत्राण' में कवि दुखों को हटाने की बात नहीं करते। वे दुखों को सहने और उनसे पार पाने के लिए साहस और निर्भीकता की माँग करते हैं।प्रश्न 3: "जगत में लाभ अगर वंचना रही, तो भी मन में ना मानूँ क्षय" — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि यदि जीवन में कदम-कदम पर नुकसान उठाना पड़े या चारों तरफ से केवल धोखा (वंचना) ही मिले, तब भी कवि का मन निराश न हो। वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मानसिक शक्ति और हौसले को बनाए रखना चाहते हैं।प्रश्न 4: कवि अंत में ईश्वर से क्या प्रतिज्ञा या इच्छा व्यक्त करता है?उत्तर: कवि कहते हैं कि चाहे सुख के दिन हों या दुख की काली रात, जब पूरी दुनिया उनका साथ छोड़ दे और उन पर हँसे, तब भी वे ईश्वर की सत्ता पर कभी कोई संदेह (शंका) न करें। उनका विश्वास ईश्वर पर हमेशा अडिग रहे।📝 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Q&A)प्रश्न 1: कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना कर रहा है?उत्तर: कवि ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि विपत्तियाँ आने पर वे भयभीत न हों। यदि दुखों के समय उन्हें सांत्वना देने वाला कोई न मिले, तब भी उनका आत्मबल और पौरुष न डगमगाए। वे हर परिस्थिति में दुखों पर विजय पाने की शक्ति माँगते हैं।प्रश्न 2: 'आत्मत्राण' कविता अन्य प्रार्थना गीतों से किस प्रकार भिन्न है?उत्तर: सामान्य प्रार्थना गीतों में लोग ईश्वर से दुख, कष्ट और बीमारियाँ दूर करने की गुहार लगाते हैं या सुख-संपत्ति माँगते हैं। इसके विपरीत, 'आत्मत्राण' में कवि दुखों को हटाने की बात नहीं करते। वे दुखों को सहने और उनसे पार पाने के लिए साहस और निर्भीकता की माँग करते हैं।प्रश्न 3: "जगत में लाभ अगर वंचना रही, तो भी मन में ना मानूँ क्षय" — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।प्रमुख साहित्यिक एवं ज्ञानकोश स्रोत:
- पहला अंश: