बातूनी कछुआ और हंस

पंडित विष्णु शर्मा 11 Aug, 2026 6 बार पढ़ा गया
बातूनी कछुआ और हंस

2. बातूनी कछुआ और हंस (The Talking Tortoise and Geese)

विस्तृत कहानी: मगध देश के एक बहुत ही सुंदर और हरे-भरे जंगल में 'फुल्लोत्पल' नाम का एक विशाल जलाशय (तालाब) था। उस तालाब का पानी शीशे की तरह साफ और मीठा था। उस तालाब में 'कंबुग्रीव' नाम का एक कछुआ रहता था। उसी तालाब के किनारे 'संकट' और 'विकट' नाम के दो हंस भी आ बसे थे।

समय के साथ कछुए और दोनों हंसों के बीच गहरी आत्मीयता हो गई। वे तीनों रोज़ तालाब के किनारे बैठते, ढेरों बातें करते, सुख-दुख बाँटते और शाम होते ही अपने-अपने निवास पर लौट जाते। कछुआ स्वभाव से बहुत हंसमुख था, लेकिन उसमें एक बहुत बड़ी बुराई थी—वह बेहद बातूनी था। उसे बिना वजह बोलते रहने की आदत थी।

एक बार उस क्षेत्र में भयानक अकाल पड़ा। कई महीनों तक बादलों ने पानी की एक बूंद भी नहीं बरसाई। भीषण गर्मी के कारण धीरे-धीरे नदियाँ, नाले और तालाब सूखने लगे। फुल्लोत्पल तालाब का पानी भी दिन-ब-दिन घटने लगा। जलचर जीव पानी के बिना तड़प-तड़पकर मरने लगे।

अपने मित्र कछुए की यह दयनीय स्थिति देखकर दोनों हंस बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने कछुए से कहा, "मित्र! इस तालाब का पानी बहुत जल्द पूरी तरह सूख जाएगा। यदि हम यहाँ रहे तो तुम पानी के बिना जीवित नहीं रह पाओगे। हमें यहाँ से दूर स्थित किसी ऐसे बड़े सरोवर में चले जाना चाहिए जहाँ पूरे साल लबालब पानी रहता हो।"

कछुए ने उदास होकर कहा, "प्रिय मित्रों! तुम दोनों तो पंख फैलाकर उड़कर दूसरी जगह चले जाओगे, लेकिन मेरे पास तो पंख नहीं हैं। मैं रेंग-रेंगकर इतनी दूर कैसे पहुँच पाऊँगा? पानी खत्म होते ही मेरी मृत्यु निश्चित है।"

हंस अपने मित्र को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उन्होंने काफी विचार किया और अंत में एक उपाय खोज निकाला। हंसों ने कछुए से कहा, "हमारे पास एक योजना है। हम एक मजबूत लकड़ी की छड़ी लेकर आएंगे। तुम उस छड़ी को अपने मुँह से बीच में कसकर पकड़ लेना। इसके बाद हम दोनों लकड़ी के दोनों सिरों को अपनी-अपनी चोंच में दबा लेंगे और उड़ चलेंगे। इस तरह हम तुम्हें हवा में उड़ाकर उस विशाल झील तक ले जाएंगे।"

कछुआ यह सुनकर बहुत खुश हुआ, लेकिन हंसों ने उसे तुरंत चेतावनी देते हुए कहा, "मित्र! इस योजना में एक बहुत बड़ा जोखिम है। यात्रा के दौरान जब हम हवा में उड़ रहे होंगे, तब तुम्हें अपना मुँह पूरी तरह बंद रखना होगा। रास्ते में लोग तुम्हें हवा में उड़ता देखकर हैरान होंगे और तरह-तरह की बातें करेंगे। लेकिन तुम भूलकर भी उत्तर देने के लिए अपना मुँह मत खोलना। यदि तुमने ज़रा सा भी मुँह खोला, तो तुम्हारे मुँह से लकड़ी छूट जाएगी और तुम सीधे ज़मीन पर गिरकर अपने प्राण गँवा बैठोगे।"

कछुए ने हंसों को आश्वासन देते हुए कहा, "क्या तुम मुझे इतना मूर्ख समझते हो? अपनी जान बचाने के लिए क्या मैं इतना संयम भी नहीं रख सकता? मैं वादा करता हूँ कि पूरी यात्रा के दौरान एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।"

अगले ही दिन योजना के अनुसार दोनों हंस एक सूखी और मजबूत लकड़ी ले आए। कछुए ने लकड़ी को बीच से अपने मजबूत जबड़ों में दबा लिया। हंसों ने दोनों सिरों को अपनी चोंच में पकड़ा और पंख फड़फड़ाते हुए नीले आसमान की ओर उड़ान भर ली।

हंस कछुए को लेकर एक शहर के ऊपर से उड़ रहे थे। ज़मीन पर रहने वाले लोगों ने जब आसमान में यह अभूतपूर्व दृश्य देखा कि दो पक्षी एक लकड़ी के सहारे कछुए को उड़ाकर ले जा रहे हैं, तो वे हैरान रह गए। देखते ही देखते नीचे गाँव के बच्चों, पुरुषों और महिलाओं की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई।

लोग तालियाँ बजाने लगे और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, "देखो! देखो! आसमान में अजूबा! हंस कछुए को उड़ाकर ले जा रहे हैं!" कुछ लोग मज़ाक बनाते हुए बोले, "अगर यह कछुआ नीचे गिर जाए, तो हम इसे यहीं भूनकर खा जाएंगे!"

नीचे खड़े लोगों का यह शोर और मज़ाक सुनकर कछुए का खून खौल उठा। वह अपना गुस्सा काबू में न रख सका और हंसों की दी हुई चेतावनी को पूरी तरह भूल गया। उसने लोगों को जवाब देने के लिए जैसे ही अपना मुँह खोला और कहा, "तुम सब मेरी धूल खाओगे...", वैसे ही उसके मुँह से लकड़ी छूट गई।

कछुआ हवा से तेज़ी से नीचे गिरा और पत्थरों पर जा टकराया। पलक झपकते ही उसका शरीर चकनाचूर हो गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। आसमान से दोनों हंस असहाय होकर अपने मित्र की मूर्खता और दुखद अंत को देखते रह गए।

कहानी की सीख (Moral): अनवसरवचनं विनाशाय (असमय और बिना सोचे-समझे बोलना विनाश का कारण बनता है)। बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो जानता है कि कब, कहाँ और कितना बोलना है। अपने हितैषियों और शुभचिंतकों द्वारा दी गई सही सलाह को जो इंसान अपने अहंकार या अज्ञानता में नज़रअंदाज़ कर देता है, उसका अंत कछुए की तरह दुखद ही होता है।