पुष्प की अभिलाषा
माखनलाल चतुर्वेदी
11 Aug, 2026
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पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।
कविता का भावार्थ:
इस कविता में एक फूल अपनी आंतरिक इच्छा प्रकट करता है। फूल कहता है कि उसे न तो किसी सुंदरी के गहनों में सजने की चाह है, न प्रेमिका के हार में पिरोये जाने की, न सम्राटों के शव पर गिरने की और न ही देवताओं के सिर पर चढ़कर गर्व करने की। उसकी एकमात्र अभिलाषा यह है कि माली उसे उस रास्ते पर फेंक दे, जहाँ से देश के वीर जवान अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने जा रहे हों।