वीरों का कैसा हो वसंत

सुभद्रा कुमारी चौहान 11 Aug, 2026 5 बार पढ़ा गया


वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्रा कुमारी चौहान

कवयित्री: सुभद्रा कुमारी चौहान

कवि परिचय: इनका जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वे भारतीय राष्ट्रीय चेतना की प्रमुख कवयित्री थीं। उनकी अमर रचना 'झांसी की रानी' हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक स्थान रखती है।

वीरों का कैसा हो वसंत?

आ रही हिमाचल से पुकार,

है उदधि गरजता बार-बार,

प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार;

सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत— वीरों का कैसा हो वसंत?

फूली सरसों ने दिया रंग,

मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,

वसुधा पुलकित, हे वीर कंत!

पर देह-ऋतु का कंत अंत, वीरों का कैसा हो वसंत?

कह दे अतीत अब मौन त्याग,

लंका में कुरुक्षेत्र में जाग;

हलचल मच जावे आज बाग,

कुरुक्षेत्र अब जग पड़े अंत— वीरों का कैसा हो वसंत?

कविता का भावार्थ:

वसंत ऋतु प्रकृति में रंग और उल्हास लेकर आती है, लेकिन कवयित्री पूछती हैं कि देश की सीमा पर खड़े वीरों का वसंत कैसा होना चाहिए? दिशा-दिशा से यही सवाल गूँज रहा है। वीरों के लिए प्राकृतिक सौंदर्य और रंग-उत्सव नहीं, बल्कि देश की रक्षा के लिए युद्धभूमि में अपने शौर्य, पराक्रम और बलिदान का प्रदर्शन करना ही असली वसंत है।