हिमालय

रामधारी सिंह 'दिनकर' 11 Aug, 2026 4 बार पढ़ा गया


हिमालय - रामधारी सिंह 'दिनकर' (विस्तृत वर्ज़न)

कवि: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर'

कवि परिचय: रामधारी सिंह 'दिनकर' (23 सितंबर 1908 – 24 अप्रैल 1974) हिंदी साहित्य के वीर रस और ओजस्वी चेतना के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रकवि हैं। स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात, उन्होंने अपनी लेखनी से देश की स्वाभिमान-अग्नि को सदा प्रज्वलित रखा। उन्हें 'उर्वशी' के लिए ज्ञानपीठ और 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

साकार, दिव्य, गौरव-विराट,

पौरुष के पूँजीभूत ज्वाल!

मेरी जननी के हिम-किरीट!

युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त,

युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

निःसीम व्योम में तान तान,

कैसा यह अमर प्रणाम!

कह, तपस्वी! तू कौन महान?

किस मग्न समाधि में लीन?

किस महाशून्य में खोज रहा

किस जटिल समस्या का निदान?

तू मौन रहा, पर दिशा-दिशा,

तप-अग्नि से तेरी भर उठी,

जग के पीड़ित मानस का,

तू एक अचल, अद्वैत त्राण!

विस्तृत भावार्थ व व्याख्या:

हिमालय का स्वरूप: दिनकर जी हिमालय को केवल एक बर्फ का पहाड़ नहीं मानते, बल्कि उसे भारत के स्वाभिमान, दिव्य पौरुष और शक्ति पुंज की साक्षात मूर्ति स्वीकार करते हैं। वे उसे भारत माता का शीश-मुकुट (हिम-किरीट) संबोधित करते हैं।

आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय संदेश: कवि हिमालय की तुलना एक महान योगी या तपस्वी से करते हैं जो युगों-युगों से एक मग्न समाधि में स्थिर है। वह मौन रहकर भी संपूर्ण विश्व को यह संदेश देता है कि अपनी जड़ों, आत्म-सम्मान और स्वतंत्रता के साथ कभी समझौता नहीं करना चाहिए।