पुष्प की अभिलाषा

माखनलाल चतुर्वेदी 11 Aug, 2026 5 बार पढ़ा गया


पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी

कवि: माखनलाल चतुर्वेदी (उपनाम: 'एक भारतीय आत्मा')

कवि परिचय: इनका जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्य प्रदेश में हुआ था। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और महान कवि थे। उनकी कालजयी कृति 'हिम तरंगिणी' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,

चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे तोड़ लेना वनमाली!

उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने

जिस पथ जावें वीर अनेक।

कविता का भावार्थ:

इस कविता में एक फूल अपनी आंतरिक इच्छा प्रकट करता है। फूल कहता है कि उसे न तो किसी सुंदरी के गहनों में सजने की चाह है, न प्रेमिका के हार में पिरोये जाने की, न सम्राटों के शव पर गिरने की और न ही देवताओं के सिर पर चढ़कर गर्व करने की। उसकी एकमात्र अभिलाषा यह है कि माली उसे उस रास्ते पर फेंक दे, जहाँ से देश के वीर जवान अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने जा रहे हों।