मूर्ख बंदर और लकड़ी की खूंटी

पंडित विष्णु शर्मा 11 Aug, 2026 7 बार पढ़ा गया
मूर्ख बंदर और लकड़ी की खूंटी

4. मूर्ख बंदर और लकड़ी की खूंटी (The Monkey and the Wedge)

विस्तृत कहानी: एक समृद्ध नगर के पास एक विशाल मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। मंदिर के निर्माण के लिए दूर-दूर के जंगलों से इमारती लकड़ियों के भारी-भरकम लट्ठे लाए गए थे। मंदिर के अहाते में कई कुशल बढ़ई (खाती) दिन-रात मेहनत करके लकड़ियों को चीरने, तराशने और खंभे बनाने के काम में लगे रहते थे।

उसी निर्माण स्थल के पास एक घना जंगल था, जहाँ बंदरों का एक विशाल झुंड रहता था। वे बंदर अक्सर मंदिर के अहाते में आ जाते थे और वहाँ पड़े सामान के साथ उछल-कूद करते थे। काम पर मौजूद बढ़ई अक्सर उन बंदरों को डांट-डपटकर या खाने की चीज़ें फेंककर भगा दिया करते थे।

एक दिन दोपहर के समय बहुत तेज़ धूप थी। सभी बढ़ई लकड़ी काटने का काम आधा छोड़कर दोपहर का भोजन करने और थोड़ा विश्राम करने के लिए पास के एक शामियाने में चले गए। उस समय एक बढ़ई एक विशाल और भारी लकड़ी के लट्ठे को बीच से आरी से चीर रहा था। लट्ठा आधा चिर चुका था। लकड़ियों का चीरा आपस में दोबारा न चिपक जाए और आरी फँसे नहीं, इसलिए बढ़ई ने चीरे के बीच में लकड़ी की एक त्रिकोणी खूंटी (fissure wedge) मजबूती से ठोंक दी थी।

बढ़इयों के जाते ही बंदरों का झुंड पेड़ से उतरकर निर्माण स्थल पर आ पहुँचा। वे औजारों को उठाने, लकड़ियों पर छलांग लगाने और उथल-पुथल मचाने लगे। उसी झुंड में एक बहुत ही नटखट और चंचल बंदर था। उसकी आदत हर चीज़ में टांग अड़ाने और बिना वजह छेड़छाड़ करने की थी।

वह नटखट बंदर उछलता हुआ उसी आधे चीरे हुए विशाल लट्ठे के ऊपर जाकर बैठ गया। बैठते ही उसकी नज़र लट्ठे के बीच में फँसी हुई उस लकड़ी की खूंटी पर पड़ी। उसे देखकर बंदर के मन में कौतूहल पैदा हुआ कि यह चीज़ क्या है और यहाँ क्यों फँसाई गई है।

बंदर ने खूंटी को अपने हाथों से पकड़ लिया और उसे हिलाने लगा। जब वह लट्ठे पर बैठा हुआ था, तो उसकी लंबी पूँछ और शरीर का निचला हिस्सा लट्ठे के दोनों चीरे हुए हिस्सों के बिल्कुल बीच में लटक रहा था। वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि वह कितनी खतरनाक जगह पर बैठा है।

झुंड के कुछ समझदार और बूढ़े बंदरों ने जब उसे खूंटी से छेड़छाड़ करते देखा, तो उन्होंने उसे सचेत करने की कोशिश की। लेकिन अपनी धुन में मस्त उस चंचल बंदर ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। वह अपने दोनों हाथों से खूंटी को पूरी ताकत लगाकर ऊपर की ओर खींचने लगा।

काफी जोर लगाने के बाद, अचानक से वह खूंटी लट्ठे के चीरे से बाहर निकल आई। खूंटी के निकलते ही, तनाव के कारण लकड़ी के दोनों भारी हिस्से भयानक गति और शक्ति के साथ आपस में कड़ाके की आवाज़ के साथ चिपक गए।

दुर्भाग्य से, बंदर की पूँछ और उसके शरीर का निचला हिस्सा उन दोनों भारी लकड़ी के हिस्सों के बीच कसकर फँस गया। बंदर असह्य दर्द से चीखने-चिल्लाने लगा। उसने अपनी पूँछ छुड़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन चीरा इतनी कसकर बंद हुआ था कि उसका निकलना असंभव था। अत्यधिक पीड़ा और खून बहने के कारण कुछ ही देर में उस मूर्ख बंदर ने तड़प-तड़पकर अपने प्राण त्याग दिए।

कहानी की सीख (Moral): अव्यापारेषु व्यापारः (जिस काम से हमारा कोई लेना-देना न हो या जिसकी हमें जानकारी न हो, उसमें अनधिकार हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए)। दूसरों के काम में बिना सोचे-समझे टांग अड़ाना और अज्ञानता में मूर्खतापूर्ण दुस्साहस करना अपने ही विनाश का कारण बनता है।