वीरों का कैसा हो वसंत
सुभद्रा कुमारी चौहान
11 Aug, 2026
6 बार पढ़ा गया
वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्रा कुमारी चौहान
वीरों का कैसा हो वसंत?
आ रही हिमाचल से पुकार,
है उदधि गरजता बार-बार,
प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार;
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत— वीरों का कैसा हो वसंत?
फूली सरसों ने दिया रंग,
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,
वसुधा पुलकित, हे वीर कंत!
पर देह-ऋतु का कंत अंत, वीरों का कैसा हो वसंत?
कह दे अतीत अब मौन त्याग,
लंका में कुरुक्षेत्र में जाग;
हलचल मच जावे आज बाग,
कुरुक्षेत्र अब जग पड़े अंत— वीरों का कैसा हो वसंत?
कविता का भावार्थ:
वसंत ऋतु प्रकृति में रंग और उल्हास लेकर आती है, लेकिन कवयित्री पूछती हैं कि देश की सीमा पर खड़े वीरों का वसंत कैसा होना चाहिए? दिशा-दिशा से यही सवाल गूँज रहा है। वीरों के लिए प्राकृतिक सौंदर्य और रंग-उत्सव नहीं, बल्कि देश की रक्षा के लिए युद्धभूमि में अपने शौर्य, पराक्रम और बलिदान का प्रदर्शन करना ही असली वसंत है।