The Jackal in the Lion’s Skin: A Tale of Deception and Nature

Admin March 20, 2026
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प्राचीन समय की बात है, एक विशाल जंगल के पास एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। उसी जंगल में चतुर नाम का एक सियार रहता था। चतुर स्वभाव से बहुत ही आलसी और कामचोर था। वह हमेशा इसी ताक में रहता था कि उसे बिना मेहनत किए भरपेट भोजन मिल जाए। लेकिन जंगल के अन्य जानवर बहुत सतर्क रहते थे, जिसके कारण चतुर को अक्सर भूखा ही सोना पड़ता था।

एक दिन, चतुर भोजन की तलाश में भटकते हुए गाँव की सीमा तक जा पहुँचा। वहाँ एक धोबी घाट था जहाँ धोबी कपड़े सुखा रहा था। चतुर ने देखा कि घास के ऊपर एक शेर की खाल सूखने के लिए रखी हुई है। शायद किसी शिकारी ने उसे वहां छोड़ दिया था। सियार के दिमाग में अचानक एक खुराफाती विचार आया। उसने सोचा, "अगर मैं इस खाल को ओढ़ लूँ, तो पूरा जंगल मुझे शेर समझेगा। फिर मुझे शिकार करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि जानवर खुद डरकर अपना भोजन छोड़ भागेंगे और मैं मजे से दावत उड़ाऊँगा।"

उसने सावधानी से वह खाल उठाई और अपने शरीर पर लपेट ली। वह सियार अब हुबहू एक खूंखार शेर की तरह दिखने लगा था।

जंगल में आतंक और राज

जैसे ही चतुर शेर की खाल पहनकर जंगल में दाखिल हुआ, वहाँ हड़कंप मच गया। हिरण, खरगोश और यहाँ तक कि जंगली सुअर भी उसे देखते ही दुम दबाकर भागने लगे। बंदरों ने पेड़ों पर चढ़कर शोर मचाना शुरू कर दिया, "भागो! भागो! नया शेर आया है!"

सियार को अपनी योजना सफल होती दिखी। उसने मन ही मन सोचा, "वाह! अब मैं इस जंगल का असली राजा हूँ।" उसने एक गुफा पर कब्ज़ा कर लिया और ठाठ से रहने लगा। जब भी उसे भूख लगती, वह बस बाहर टहलने निकल जाता। उसे देखते ही छोटे जानवर अपना शिकार छोड़कर भाग जाते और चतुर बिना किसी मेहनत के ताज़ा मांस का आनंद लेता। धीरे-धीरे वह सियार काफी मोटा और अभिमानी हो गया। यहाँ तक कि वह अपने पुराने सियार मित्रों को भी तुच्छ समझने लगा और उन्हें अपनी गुफा के पास फटकने तक नहीं देता था।

सत्य का प्रकटीकरण

समय बीतता गया और चतुर का झूठ पूरी तरह स्थापित हो गया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। एक चांदनी रात थी, चारों ओर शांति छाई हुई थी। चतुर अपनी गुफा के बाहर एक ऊँची चट्टान पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था।

तभी, पास की पहाड़ियों से सियारों के एक झुंड के चिल्लाने की आवाज़ आई— "ऊँऊँ... ऊँऊँ... क्याऊँ!" सियार की यह फितरत होती है कि जब वह अपने भाइयों की आवाज़ सुनता है, तो वह खुद को जवाब देने से रोक नहीं पाता। चतुर यह पूरी तरह भूल गया कि उसने शेर की खाल पहनी है और वह इस समय जंगल का 'राजा' बना बैठा है। जैसे ही सियारों का शोर उसके कानों में पड़ा, उसका जन्मजात स्वभाव जाग उठा। उसने अपना सिर आसमान की ओर उठाया और पूरी ताकत से चिल्लाने लगा— "ऊँऊँ... ऊँऊँ... क्याऊँ!"

पास ही झाड़ियों में छिपे कुछ जानवर, जो उस 'शेर' की सेवा करने या उससे डरने के लिए वहां मौजूद थे, चौंक गए। उन्होंने ध्यान से सुना और आपस में फुसफुसाने लगे, "अरे! यह तो शेर की दहाड़ नहीं है। यह तो एक मामूली सियार की आवाज़ है!"

झूठ का अंत

जानवरों को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। उन्होंने गौर से देखा तो पाया कि उस शेर की खाल के नीचे से सियार की पूंछ बाहर निकली हुई थी। देखते ही देखते पूरे जंगल में खबर फैल गई कि एक नीच सियार ने सबको बेवकूफ बनाया है।

तभी एक बूढ़ा हाथी आगे बढ़ा और उसने अपनी सूंड से सियार के ऊपर से वह खाल खींच ली। अब सियार का असली रूप सबके सामने था—एक दुबला-पतला और डरपोक जानवर। जानवरों का डर अब गुस्से में बदल चुका था। भेड़ियों और कुत्तों ने उसे घेर लिया। अपनी जान बचाने के लिए चतुर सियार को वहाँ से ऐसी दौड़ लगानी पड़ी कि वह फिर कभी उस जंगल में दिखाई नहीं दिया।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि "झूठ की नींव पर खड़ा महल कभी न कभी गिरता ही है।" इंसान बाहरी वेशभूषा बदलकर दूसरों को कुछ समय के लिए धोखा दे सकता है, लेकिन उसका असली स्वभाव और संस्कार कभी छिप नहीं सकते। अपनी योग्यता बढ़ाना श्रेष्ठ है, न कि दूसरों का मुखौटा पहनकर श्रेष्ठता का ढोंग करना।

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