ब्राह्मण और तीन ठग
5. ब्राह्मण और तीन ठग (The Brahmin and the Three Crooks)
विस्तृत कहानी: 'मित्रशर्मा' नाम का एक सीधा-साधा और धार्मिक विचारों वाला ब्राह्मण एक गाँव में रहता था। वह पूजा-पाठ और यज्ञानुष्ठान कराकर अपना जीवन-यापन करता था। एक बार एक धनी यजमान ने यज्ञ संपन्न कराने के बाद प्रसन्न होकर ब्राह्मण को उपहार स्वरूप एक स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट बकरी भेंट की।
ब्राह्मण उपहार में बकरी पाकर बहुत खुश हुआ। बकरी भारी थी और रेंगकर चल रही थी, इसलिए ब्राह्मण ने उसके चारों पैरों को बाँधकर उसे अपने कंधों पर लाद लिया ताकि वह आसानी से और जल्दी अपने घर पहुँच सके। वह जंगल के रास्ते अपने घर की ओर पैदल चल पड़ा।
उसी जंगल के रास्ते में तीन चतुर और शातिर ठग छिपे हुए थे। वे कई दिनों से भूखे थे और किसी शिकार की तलाश में थे। जब उन्होंने कंधे पर मोटी-ताजी बकरी लादकर आते हुए ब्राह्मण को देखा, तो उनके मुँह में पानी आ गया। उन्होंने आपस में विचार किया कि यदि यह बकरी हमें मिल जाए, तो कई दिनों के भोजन का प्रबंध हो जाएगा।
लेकिन ब्राह्मण से बलपूर्वक बकरी छीनना आसान नहीं था क्योंकि पास के रास्ते से गाँव वाले गुज़रते रहते थे। इसलिए सबसे बड़े ठग ने कहा, "हम इस ब्राह्मण को शारीरिक बल से नहीं, बल्कि अपनी चालाकी और बुद्धि से ठगेंगे। हम इसके मन में ऐसा भ्रम पैदा कर देंगे कि यह खुद ही इस बकरी को फेंककर भाग जाएगा।" तीनों ठगों ने मिलकर एक योजना बनाई।
योजना के अनुसार, तीनों ठग थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रास्ते में अलग-अलग जगहों पर जा खड़े हुए। जब ब्राह्मण थोड़ा आगे बढ़ा, तो पहला ठग उसके सामने आया और बहुत ही आश्चर्यजनक नाटक करते हुए बोला, "हे महान ब्राह्मण! प्रणाम। लेकिन यह आप क्या कर रहे हैं? आप जैसे पवित्र और ज्ञानी पंडित अपने कंधों पर इस अशुद्ध और गंदे कुत्ते को लादकर कहाँ ले जा रहे हैं? क्या आपका धर्म भ्रष्ट हो गया है?"
यह सुनकर ब्राह्मण को बहुत गुस्सा आया। उसने ठग को डांटते हुए कहा, "मूर्ख! क्या तुझे दिखाई नहीं देता? यह कुत्ता नहीं, बल्कि एक सुंदर और पवित्र बकरी है जिसे मेरे यजमान ने मुझे दान में दिया है। अपनी आँखें इलाज कराओ!" ठग ने हाथ जोड़े और कहा, "महाराज, गुस्सा मत कीजिए। मुझे जो दिखा मैंने वही कहा, आगे आपकी मर्जी।" यह कहकर वह चला गया।
ब्राह्मण ने बकरी को कंधे पर सही से संभाला और आगे बढ़ गया। थोड़ी दूर जाने के बाद दूसरा ठग सामने से आया। उसने ब्राह्मण को देखा और अपना सिर पीटते हुए बोला, "हे भगवान! आज यह कैसा कलियुग आ गया है! एक विद्वान ब्राह्मण अपने कंधों पर एक मरे हुए गधे के बच्चे को लादे जा रहा है! पंडित जी, आपको समाज में मुँह दिखाने में शर्म नहीं आती?"
यह सुनकर ब्राह्मण का दिमाग चकरा गया। उसने बकरी को नीचे उतारा, उसे ध्यान से देखा, छुआ और आश्वस्त हुआ कि यह तो बकरी ही है। उसने दूसरे ठग को खरी-खोटी सुनाई, "अंधे इंसान! यह गधा नहीं बकरी है। लगता है तुम सब पागल हो गए हो।" दूसरा ठग हँसते हुए आगे निकल गया।
अब ब्राह्मण के मन में हल्का सा संदेह पैदा होने लगा था। वह सोचने लगा कि क्या सचमुच दो-दो लोग एक ही जैसी बात गलत कह सकते हैं? फिर भी उसने हिम्मत बांधी और बकरी को उठाकर फिर से कंधे पर रखा और चलने लगा।
कुछ ही दूरी पर तीसरा ठग खड़ा था। जैसे ही ब्राह्मण उसके पास से गुज़रा, तीसरा ठग पीछे हट गया और डरने का नाटक करते हुए बोला, "हे देव! आप इस खूंखार और गंदे लंगूर (या जंगली जानवर) को अपने गले में लपेटकर क्यों घूम रहे हैं? यह तो आपको काट खाएगा!"
तीसरे ठग के मुँह से भी वही बात सुनकर ब्राह्मण पूरी तरह से भ्रमित और भयभीत हो गया। उसके मन में यह दृढ़ विश्वास बैठ गया कि यह कोई साधारण बकरी नहीं है, बल्कि कोई मायावी पिशाच या राक्षस है जो बार-बार अपना रूप बदल रहा है—कभी कुत्ता, कभी गधा और कभी लंगूर बन जाता है!
डर के मारे ब्राह्मण के हाथ-पांव कांपने लगे। उसने बिना एक पल गंवाए कंधे से बकरी को ज़मीन पर पटक दिया और अपनी जान बचाने के लिए पीछे मुड़कर बिना देखे अपने घर की ओर सरपट भाग खड़ा हुआ।
इधर तीनों ठग झाड़ियों से बाहर निकले, ज़ोर-ज़ोर से हँसे और खुशी-खुशी बकरी को लेकर अपने रास्ते चले गए।
कहानी की सीख (Moral): बार-बार बोले गए झूठ से भ्रमित नहीं होना चाहिए। यदि कई लोग मिलकर एक ही झूठ को बार-बार दोहराएँ, तो भी अपनी बुद्धि, प्रत्यक्ष प्रमाण और विवेक पर भरोसा रखना चाहिए। दूसरों की बातों में आकर अपने प्रत्यक्ष ज्ञान पर संदेह करना विनाशकारी साबित होता है।