सियार और ढोल

पंडित विष्णु शर्मा 11 Aug, 2026 6 बार पढ़ा गया
सियार और ढोल


3. सियार और ढोल (The Jackal and the Drum)

विस्तृत कहानी: 'गोमायु' नाम का एक भूखा सियार भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटक रहा था। कई दिनों से उसे भरपेट भोजन नहीं मिला था, जिससे उसका शरीर कमज़ोर हो चुका था। भोजन ढूँढते-ढूँढते वह जंगल की सीमा लांघकर एक पुराने युद्धक्षेत्र के समीप पहुँच गया।

वह क्षेत्र वीरान और सुनसान था। कुछ समय पहले वहाँ दो राजाओं की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ था। युद्ध समाप्त होने के बाद सेनाएँ तो चली गईं, लेकिन वहाँ सेना का काफी सामान छितरा पड़ा था। उसी सामान में एक विशाल नगाड़ा (ढोल) भी एक बड़े सूखे पेड़ के तने के पास छूटा रह गया था।

जब-जब तेज़ हवा चलती, तो उस सूखे पेड़ की भारी और सूखी टहनियाँ हवा के झोंकों से हिलीं और ढोल की कसी हुई चमड़े की सतह से ज़ोर से टकरा जातीं। इस टकराहट से पूरे वीरान इलाके में "धम-धम... ढम-ढम!" की एक बेहद भारी और डरावनी आवाज़ गूँज उठती।

भूखा सियार जब झाड़ियों के बीच से गुज़र रहा था, तब अचानक उसने वह गर्जना जैसी डरावनी आवाज़ सुनी। सियार का दिल दहल गया। उसने ऐसी भयानक और गूँजती हुई आवाज़ अपने जीवन में पहले कभी नहीं सुनी थी।

सियार के कदम वहीं रुक गए। वह थर-थर कांपने लगा और मन ही मन सोचने लगा, "अरे बाप रे! यह किस विकराल और भयंकर राक्षस की आवाज़ है? ऐसा प्रतीत होता है कि कोई विशालकाय प्राणी यहाँ छिपा बैठा है। यदि उसने मुझे देख लिया तो वह मुझे एक ही ग्रास में चबा जाएगा। मुझे अपनी जान बचाकर यहाँ से तुरंत भाग जाना चाहिए।"

वह पीछे मुड़कर भागने ही वाला था कि अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने सोचा, "भय के मारे बिना सोचे-समझे भाग जाना कायरता है। किसी भी परिस्थिति से डरकर भागने से पहले उस भय के कारण को भली-भांति जान लेना चाहिए। नीतिशास्त्र भी यही कहता है कि बिना सच्चाई जाने निर्णय नहीं लेना चाहिए।"

सियार ने अपनी हिम्मत जुटाई और बहुत ही सावधानीपूर्वक, ज़मीन पर रेंगते हुए झाड़ियों के पीछे छिप-छिपकर उस आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ने लगा। वह अपनी आँखें और कान खुले रखे हुए था ताकि कोई भी संकट आते ही भाग सके।

जब वह पेड़ के पास पहुँचा, तो उसने झाड़ियों के बीच से झाँककर देखा। वहाँ कोई दैत्य या विशालकाय जानवर नहीं था, बल्कि गोल आकार का एक बड़ा सा ढोल पड़ा था। हवा का झोंका आते ही पेड़ की शाखा उससे टकराती और ढोल बज उठता। सियार ने काफी देर तक छिपकर इस प्रक्रिया को देखा और समझ गया कि यह तो एक निर्जीव वस्तु है और इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

सियार का सारा डर पल भर में हवा हो गया। वह सीना तानकर ढोल के पास गया। उसने ढोल को चारों तरफ से सूँघा और देखा कि ढोल की ऊपरी सतह बहुत ही मोटी और कसी हुई चमड़ी से मढ़ी हुई थी।

सियार ने मन ही मन सोचा, "अहा! यह तो चमड़े से बना है। जो चीज़ बाहर से इतनी विशाल और भारी-भरकम है और जिसकी आवाज़ में इतनी गर्जना है, निश्चित ही इसके अंदर स्वादिष्य माँस, वसा और ताज़ा रक्त भरा होगा। आज तो कई दिनों की भूख एक साथ मिट जाएगी!"

सियार खुशी से उछल पड़ा। उसने बिना देर किए अपने नुकीले दांतों और पैने पंजों से ढोल की मोटी चमड़ी को फाड़ना शुरू कर दिया। काफी मशक्कत और मेहनत के बाद वह ढोल के चमड़े को चीरने में सफल हो गया।

जैसे ही सियार उत्सुकता से ढोल के अंदर घुसा, उसके होश उड़ गए। ढोल के अंदर पूरी तरह से खोखलापन और सूखी हवा के अलावा कुछ नहीं था। वहाँ न तो माँस का एक टुकड़ा था और न ही भोजन की एक बूंद। सियार ठगा सा रह गया।

यद्यपि सियार को भोजन नहीं मिला और उसकी मेहनत बेकार गई, लेकिन उसे इस बात का संतोष था कि उसने अपने डर पर विजय पा ली थी। यदि वह डरकर भाग जाता, तो जिंदगी भर उस अनाम डर से डरा रहता।

कहानी की सीख (Moral): भयस्य हि भेतव्यं यावद्भयमनागतम् (भय से तब तक डरना चाहिए जब तक वह सामने न आया हो, लेकिन भय के सामने आते ही उस पर प्रहार करना चाहिए)। केवल बाहरी दिखावे, भारी आवाज़ या आडंबर से भयभीत नहीं होना चाहिए। किसी भी चीज़ से डरकर भागने के बजाय धैर्यपूर्वक उसकी सच्चाई का पता लगाना चाहिए।